Thursday, 25 August 2016

Surprise yourself.

Have you ever failed in your life ? One failure after the other and the cycle repeats itself again and again... it only gives pain..
Failure - if its not meant to be for you, just let it go. Don't gain pain by holding it so tight..It's just not meant for you so accept it.
Imagine yourself telling your family and loved ones that you have failed in your exams, One after another with no signs of bright future anywhere..
Its like mud in which you have been caught up so badly that you will get nothing and it will make yourself dirty and it will give you nothing but negativity...
But one thing that all these failures have taught me is how to be strong... Strong enough to decide to move on and not waste your time wrestling in the mud..
Move on.. there is something else for you waiting to get you to the successful life where you belong.
This thing is not for you.
Be strong and make a decision to move ahead.
Find a better way, try something different, choose another direction,
May be you will find your success where you have least expected it.
Life is full of surprises learn something from it and give yourself a surprise.
- Disha Joshi

Tuesday, 16 August 2016

Find what you need within

We depend on our surroundings obliquely to embody the moods and ideas we respect and then to remind us of them. We look to our buildings to hold us, like a kind of psychological mould, to a helpful vision of ourselves. We arrange around us material forms which communicate to us what we need — but are at constant risk of forgetting what we need — within.
We turn to wallpaper, benches, paintings and streets to staunch the disappearance of our true selves.
-Alain de Botton,

Try to find what you need within.

#thoughtoftheday
#knowyourself

Exploring myself

We are going to the moon that is not very far. Man has so much farther to go within himself.
- Anaïs Nin

We have so much further to go within ourselves..
We don't need to go to everywhere to find answers about life, but to jump inside the ocean of ourselves.
that is the beginning and end of everything.
Exploring the world or
Exploring yourself
choice is yours.
There are some kinds of people who travel each and every corner of this city, they are flying, diving, traveling, and exploring the world.
I find myself different, I do nothing; I just sit in one of those corners of this city and dive into myself, traveling and exploring equally.
- Disha Joshi

#exploringmyself #thoughtoftheday
#diary #drawing

Saturday, 26 September 2015

वो कोई

एक दिन अचानक
पुरानी यादों को ताज़ा करते करते
मुस्कुरा रही थी मैं
नज़रे तस्वीरों में थी
पर मुझे लगा कोने में खड़ा
कोई मुझे देख रहा हो.

वो कोई,
अब बार बार उसका अहसास होने लगा था..
मेरी हसी को सुनकर जैसे
मेरे लिए वो मुस्कुरा रहा हो।
मेरा रोना देखकर जैसे
मेरी नासमझी पर हस रहा हो.
गुस्सा करती हूँ तब लगता है जैसे
वो मुझे गुपचुप तक रहा हो.
कुछ  गलत करने से रोकता
तो कभी मुझको ही टोकता
वो कोई,

कभी मुझसे नज़रे मिलाता
तो कभी लुकाछुपि का खेल बन जाता।

वो कोई
जिसकी कोई तसवीर नहीं
पर कभी आँखें बंध करू तो
साँसों सा धड़कन के करीब वो होता है,
तन्हाई की रातों में आँखें खुले जब
अहसास उसका मेरे साथ ही सोता है।

वो कोई,
एक दिन
उसे तसवीर देने की कोशिश की
तो लगा जैसे वो मैं ही हूँ,
या मेरा ही अक्स. .
जो मेरी हर चाल चलन को,
मेरे हर अहसास को
मुझसे ही अलग होके 
जैसे मुझे ही  देख रहा हो.

किसीने सही कहा है…
कोई है अपने अंदर जो हमें
सही और गलत दिखाता है,
वो कोई,
जिसे देखने के लिए
नज़रो की ज़रूरत नहीं.

- Disha Joshi

Sunday, 3 May 2015

"और मैं हूँ "

धीरे धीरे सब ठीकहो रहा था
ज़िंदगी जैसे अब शायद
मेरी और देख रही थी,
एक पहेली जिसे सुलझा नहीं सकते,
सुलझाने से  उलझन मेरी ही बढ़ रही थी.
पर अब लग रहा था के सुलझ रही वो,
कितने साल, कितने महीने
मैंने रातों में गुज़ारे थे,
वो रातें
खामोशी में तड़पती वो रातें
पर अब अँधेरा डूब रहा था,
रोशनी उभर रही थी कहीं से
सब को लग रहा था अब सुबह होगी
वक़्त बदल रहा था, सब खुश थे,
अचानक अँधेरा बढ़ गया
मेरी नज़रो के सामने
रौशनी मुझसे छीन गई
अँधेरे में मैं थी
या मुझमे ही अँधेरा था.
अँधेरा ही अँधेरा

बेहोशसी  हो गई में
आँखें खुली जब यकीन ना हुआ,
उझालेने मुझे हर तरफ से घेर लिया था
मेरे अंदर से रौशनी उभर रही थी
के रौशनी के अंदर से में !
कोई अपना आस पास दीख नहीं रहा था,
पर में नयी थी
आस पास के लोग भी नये थे,
सब रोशन था
खिली खिली सुबह के जैसे,
अब अंदर कोई दर्द ना था
कुछ था तो वो रौशनी और बस सुकुन था
शायद अँधेरे के इस पार आ गई थी में
मेरी मौत के इस पार
जहां रौशनी है
नया जन्म है
और में हूँ
- Disha Joshi

Sunday, 18 January 2015

चाँद गिरा था झाड़ियों में

याद है वो रात,
जंगल में मैं और तुम,
निकल पड़े थे
मंज़िल का ना पता कोई,
आसमान को तकते तकते,
तारों के रास्ते चल पड़े थे,
देखा तो अचानक
चाँद गिरा दूर झाड़ियों में,
हम भाग के उसे देखने गए,
कैसा छुप रहा था वो हमसे,
धीरे से नज़दीक जाके,
तुमने उसको पकड़ा था,
चाँद ने फिर मुस्कुराके
कैसा तुमको जकड़ा था,
देखी थी तुम्हारी आँखें
उस रात, जैसे
आसमान का हिस्सा आ गया हो
तुम्हारे पास.
अँधेरे में कहीं से खुशियाँ उभर रही थी राहो में,
तारे  टीम टीमा रहे थे उनमे,
और चाँद तुम्हारी बाहों में,
तुम खुश होक  तकते रहे,
मैं बाँवरी सी तुम्हें तकती रही,
याद है वो रात?
चाँद गिरा था झाड़ियों में.
- Disha Joshi

"ज़िंदगी"

तेरी हसी की आहटों की
गहराई है ज़िंदगी,
तेरी आँखों में प्यार की
परछाई है ज़िंदगी,
मेरे अंदर छुपी
तेरी यादों की
शेहनाई है ज़िंदगी
बोहोत से लोगोने अपने तरीके से
फ़रमाई है ज़िंदगी
जो वक़्त तेरे साथ बिता,
खिल खिलाता, गन गुनाता ,
मदहोश भी, खामोश भी,
धड़कनों की रफ़्तार सा ,
कुछ पाने के अहसास सा,
पूरा पूरा सा, ज़िंदा ज़िंदा सा,
वही हसीं लम्हों में
कहीं छुपी है ज़िंदगी,
बोहोत सोचा समझा,
और ख्याल आया के
तेरे साये में जो गुज़रे,
बस वही है ज़िंदगी
हाँ वही है ज़िंदगी...
- Disha Joshi